संजय उवाच को मैने अपने जालस्थल पर स्थानांतरित कर दिया है.
नया पता यह है....
www.sanjayuvach.dailyhindinews.com
Tuesday, August 19, 2008
चिट्ठे का नया प्रकाशन स्थल
लिखने वाला Sanjay पर 5:31 AM 0 टिप्पणियाँ लेबल: sanjay uvach, संजय उवाच
Tuesday, February 26, 2008
ब्रह्मात्मज के बहाने, इंटरनैट पर हिंदी
चिट्ठाकार पर देबाशीष जी ने एक कड़ी देकर इस समाचार की ओर ध्यान आकर्षित कराया है. समाचार इस बात पर केंद्रित है कि हिंदी की स्थिति क्या है? संदर्भ हैं हिंदी फिल्मों के जाने-माने समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज द्वारा अपना ब्लॉग रोमन भाषा में लिखा जाना. मैं यहां ब्रह्मात्मज पर टिप्पणी नहीं कर रहा हूं बल्कि हिंदी के बारे में कुछ कहना चाहता हूं.
लेख में उन्हें यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि अपनी बात ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए वे रोमन का इस्तेमाल कर रहे हैं. यह बात सुनने में उन्हें बुरी लग सकती है जो इंटरनैट पर हिंदी को फलते फूलते देखना चाहते हैं. लेकिन दूसरे नजरिए से देखें तो यह इस कड़वी सच्चाई का एक उदाहरण ही है कि इंटरनैट पर आज भी हिंदी के जरिए अपनी बात ज्यादा लोगों तक नहीं पहुंचाई जा सकती.
उन्होंने यह भ्रष्ट तरीका इसीलिए चुना कि उनके लेख वे लोग भी पढ़ सकें जो हिंदी तो समझते हैं लेकिन देवनागरी नहीं पढ़ सकते. यह वैसा है कि हम किसी औजार की मदद से अपने चिट्ठे को दूसरी लिपि में दिखाने के लिंक पाठकों को देते हैं. इसमें कुछ बुरा भी नहीं. तकनीक यदि आपकी अभिव्यक्ति को विस्तार देती है तो उसका इस्तेमाल किया ही जाना चाहिए. हां आप चाहें तो यह तर्क दे सकते हें कि ऐसा ही था तो वे हिंदी में ही लिख कर उसे रोमन में दिखाने का विकल्प चुन सकते थे.
बहरहाल उनका अपना विचार है. पर इस बहाने हमें इस बात पर गौर करने का मौका मिलता है कि क्या हिंदी की स्थिति सचमुच इतनी दयनीय है. ईमानदारी से देखें तो हमें यह सच मानना ही होगा कि इंटरनेट पर अभी भी हिंदी को अपना स्थान बनाने के लिए बहुत लंबी लड़ाई लड़ना शेष है. जर्मन, फ्रेंच या अन्य योरपियन भाषाएं बोलने वाले हिंदीभाषियों से कम होने के बावजूद ये भाषाएं इंटरनेट पर उतनी अनजानी नहीं हैं जितना हमारी भाषा. शायद इसकी वजह यही है कि हमने इस दिशा में उतने बड़े प्रयास अभी नहीं किए.
कुछ दिन पहले यह समाचार आया था कि इंटरनैट पर इस्तेमाल होने वाली दस सबसे लोकप्रिय भाषाओं में हिंदी कहीं नहीं है. इस समाचार को अंग्रेजी में यहां पढ़ें. हिंदी में पढ़ने के लिए यहां जा सकते हैं. तो इस स्थिति की मुख्य वजह क्या है? क्यों हिंदी में अपनी बात कहने के लिए रोमन का सहारा लेना पड़ता है? क्या देवनागरी इतनी कमजोर है कि इंटरनैट पर इसके माध्यम से कही गई बात लोगों तक नहीं पहुंच सकती? यदि कोई ऐसा सोचता है तो वह गलत है. अलबत्ता यह बात कुछ हद तक मानी जा सकती है कि देवनागरी में लिखी गई बात इंटरनैट पर कम लोगों तक पहुंचती है. शायद इसीलिए ब्रह्मात्मज जैसे लोगों को रोमन का सहारा लेना पड़ता है.
इसका एक पहलू तकनीकी जटिलताओं से जुड़ता है और इसकी वजह भी साफ है. यूनिकोड हिंदी के बारे में आम लोगों की जानकारी अभी भी कम है. अंग्रेजी की तुलना में इंटरनैट पर हिंदी में लिखना आज भी काफी श्रमसाध्य और जटिलता लिए है. जो इसके जानकार हैं उन्हें यह बात हास्यास्पद लग सकती है और वे इस बात से सहमत भी नहीं होंगे लेकिन सामान्य प्रयोक्ता के नजरिए से सोचा जाए (जो तकनीक के जानकार नहीं हैं) तो यह बात सही लगेगी. एक आम कंप्यूटर प्रयोक्ता से विंडोज में हिंदी लिखने के लिए किए जाने वाले समायोजन की उम्मीद करना कुछ ज्यादा ही है.
यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी जटिलता के चलते हिंदी से संबंधित सामग्री इंटरनैट पर तुलनात्मक रूप से कम नजर आती है. हिंदी लेखन से संबंधित तकनीकी जटिलताओं को खत्म करने का काम अभी शुरू ही हुआ है और इसे एक निश्चित व सरल आकार लेने में कुछ और समय लगेगा. तभी इंटरनैट पर हिंदी की उपस्थिति बढ़ेगी और उपलब्ध सामग्री की विश्वसनीयता भी. लेकिन इसके बावजूद कि हिंदी के साथ कुछ जटिलताएं हैं, रोमन में लिखने का विचार एकदम गलत है. इससे स्थिति को बदलने में कोई सहायता नहीं मिलेगी.
इंटरनैट पर आज भी हिंदी का विश्वसनीय संदर्भ भंडार नहीं है. हिंदी विकी जैसी अवधारणा का जन्म हो चुका है और विस्तार जारी है लेकिन निराश कर देने वाली बात यह है कि इसे समृद्ध करने वाले लोगों का टोटा है. हिंदी के चिट्ठों की संख्या अभी मुट्ठी भर है और इसे किसी विश्वसनीय संदर्भ स्रोत का रूप लेने में शायद कई बरस लगेंगे. हिंदी विकी पर काम करने वाले स्वयंसेवकों की अपनी प्राथमिकताएं हैं और ज्यादातर जानकारी बहुत सीमित संदर्भों में ही संग्रहित की जा रही है. यहां अभी करीब 31 हजार पेज की सामग्री है. विस्तृत जानकारी के लिए यहां देखें. जाहिर है कि इंटरनैट पर हिंदी की उपस्थिति अंग्रेजी की तुलना में अभी नगण्य है.
लिखने वाला Sanjay पर 1:59 PM 8 टिप्पणियाँ लेबल: इंटरनैट, ब्रह्मात्मज, हिंदी
Thursday, February 14, 2008
ब्लॉग जगत में अब बहस के नाम पर ऐसी गुंडागर्दी होगी
लिखने वाला Sanjay पर 3:08 PM 6 टिप्पणियाँ
Wednesday, February 13, 2008
दैनिक भास्कर में आज हिंदी ब्लॉग्स पर पूरा पेज
इंटरनैट पर हिंदी को भले ही आज प्रथम दस भाषाओं में शुमार नहीं किया जा रहा हो लेकिन सच यह है कि इंटरनैट पर हिंदी के चिट्ठों की दुनिया का दिन दूनी रात चौगुनी गति से विस्तार हो रहा है. इसलिए हिंदी चिट्ठों की बात हर ओर होने लगी है. भारत के प्रमुख हिंदी दैनिक समाचारपत्र दैनिक भास्कर में आज 14 फरवरी के अंक में एक पूरा पेज हिंदी ब्लॉग्स पर केंद्रित सामग्री के साथ प्रकाशित हुआ है.
लिखने वाला Sanjay पर 4:54 PM 12 टिप्पणियाँ लेबल: दस्तक, दैनिक भास्कर, वडनेरकर, हिंदी ब्लॉग
Friday, February 8, 2008
कौन हैं वास्तव में दलित पत्रकार .....
अचानक संवेदनशीलता का ज्वार उमड़ पड़ा, मीडिया में दलितों की खोज हो रही है. इस बात पर बहस छेड़ने की कोशिश हो रही है कि मीडिया में दलित उपेक्षित क्यों हैं..... अचानक इसकी जरूरत क्यों आ पड़ी? किस छिपे हुए एजेंडे को लेकर यह षड्यंत्रपूर्ण बहस छेड़ी गई है? शायद बहस के लिए कोई और विषय नहीं बचा तो सोचा कि चलो यही पता करते हैं कि न्यूज़रूम में कितना जातिवाद है? गोया समाज में पहले से फैला जातिवाद कम है....
सत्रह साल के अपने पत्रकारिता के कॅरियर में कभी मुझे इस बारे में सोचने की जरूरत नहीं पड़ी कि मेरे साथी कौन हैं, या कि क्या वे दलित हैं. इस दौरान शायद ही कभी ऐसा हुआ होगा, जब मेरे सहकर्मियों में कोई दलित नहीं था. मुझे तो सारे नाम याद करना भी कठिन लग रहा है क्योंकि उनकी तादाद बहुत है, शायद क्योंकि मैं कभी राजधानी में नहीं रहा. लेकिन सच्चाई तो यह है कि पंद्रह साल (क्योंकि पहले दो साल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में गुजारे) पहले मुझे अखबार के दफ्तर में जबरदस्ती पहली नौकरी दिलवाने वाला मेरा दोस्त एक दलित ही था. और वे सवाल कर रहे हैं कि मीडिया में दलितों को नौकरी क्यों नहीं मिलती.
रही बात मीडिया में दलितों की तो सबसे कड़वा सच यह है कि मीडिया में वे सारे पत्रकार दलित हैं, जिन्हें उनकी मेहनत का उचित मुआवजा तक नहीं मिलता. वे दलित हैं जो आज भी महज ढाई-तीन हजार रुपए माहवार के एवज गधों की तरह काम करते हैं, न उन्हें भत्ते मिलते हैं, न फंड जमा होता है, न कोई अन्य सुविधा मिलती है. वे दलित हैं जिन्हें बिना किसी नोटिस के नौकरी से निकाल दिया जाता है. और दलित वे हैं जो सारे जहान के शोषण के खिलाफ लिखते हैं लेकिन उनके शोषण की बात कोई नहीं करता. वे खुद भी नहीं करते क्योंकि ढाई हजार रुपए की नौकरी गंवाने का माद्दा भी उनमें नहीं है.
तो कहिए कि वे कमजोर हैं, अपने शोषण के खिलाफ भी आवाज नहीं उठा सकते.... जी हां यही सच है. वे नहीं कर सकते. लेकिन उनके लिए कौन से सर्वे कराए गए आज तक? किसने पता लगाया कि देश के बहुसंख्यक मीडिया संस्थानों में पत्रकारों को वेतन आयोग की अनुशंसाओं के मुताबिक वेतन नहीं मिलता है? किसने उठाई ये आवाज कि उनके काम के घंटे तक तय नहीं हैं? किसी ने नहीं... !! और मीडिया के इन दलितों की जाति के बारे में मत पूछिए... वे हर जाति के हैं. ब्राह्मण और अन्य सवर्ण जातियों के पत्रकार भी इनमें शामिल हैं. वे पैदायशी दलित नहीं थे, उन्हें मीडिया ने दलित बना दिया.
जिनके पास लिखने को कोई मुद्दा नहीं बचा, वो ऐसे छद्म मुद्दों पर बहस करें. लिस्ट बनाएं कि कितने दलित पत्रकार हैं और किस मीडिया हाउस में किस पोस्ट पर बैठे हैं? यह गिरोहबंदी किस कलुषित एजेंडे को लागू कराने के लिए है, नहीं जानता? लेकिन कृपया पत्रकारों को जातिवाद के नाम पर बांटने के लिए इस सड़ाध मारती राजनीति का हिस्सा बनने पर विवश मत करें. न्यूजरूम में अब तक जातिवाद की गंदगी नहीं आई है. कृपया उसे साफ-सुथरा ही रहने दें. बड़े भाई अजित वडनेरकर जी ने इस कथित बहस की सच्चाई को सही भांपा और उससे अलग होने का सही फैसला किया.
मैं ब्राह्मण नहीं हूं, न दलित हूं. अब तक इस सवाल पर कभी विचार करने की जरूरत नहीं पड़ी इसलिए कभी सोचा भी नहीं और न आगे सोचूंगा कि मेरे साथी की जाति क्या है, मेरी जाति क्या है? आपको जरूरत है तो आप सोचें. फिर भी मुझसे मेरी जाति और नाम पूछेंगे तो आपके लिए मैं कल्लू चमार हूं. पेशे से पत्रकार हूं.
Monday, January 14, 2008
उसने सरेआम खुद को आग लगाई.....सब देखते रहे
यह तस्वीर आत्मदाह करने से पांच मिनट पहले ली गई. केसरिया कुरता पहने शिवकुमार चौधरी एक हाथ में जलता हुआ त्रिशूल और दूसरे हाथ में कैरॉसिन से भरी बोतल लिए है. उसके कपड़े कैरॉसिन से भीगे हैं.
मेरे शहर में बदअमनी फैली हुई है क्योंकि एक शख्स नाहक मौत का शिकार बन गया. सरेआम खुद पर कैरॉसिन डालकर खुद को आग लगा ली. सैकड़ों लोगों की भीड़ ने देखा पर जल जाने दिया. जहां घटना हुई वह कलेक्टर और एसपी के दफ्तरों के बीच कचहरी परिसर का केंद्र स्थल है और उस समय वहां क्षेत्र के सांसद अपना साप्ताहिक जनता दरबार लगाए बैठे थे.
करीब चालीस साल का वह इंसान दलित वर्ग से था. और उसने जान क्यों दे दी? मृतक एक प्राइमरी स्कूल के पालक शिक्षक संघ (पीटीए) का अध्यक्ष था. पिछले कई सालों से स्कूल की बिल्डिंग नहीं होने के कारण उसे एक मंदिर के परिसर में अस्थाई इंतजाम करके चलाया जा रहा है. पीटीए अध्यक्ष मांग कर रहा था कि स्कूल की बिल्डिंग बनवा दी जाए.
इस मांग के लिए पिछले साल भर से भी ज्यादा समय से वह प्रशासनिक अधिकारियों के हाथ पैर जोड़ रहा था, उनके ऑफिसों के चक्कर लगा रहा था लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. हारकर उसने पिछले महीने प्रशासन को लिखित सूचना दे दी कि अमुक तारीख तक उसकी मांग पूरी नहीं होने पर वह अमुक स्थान पर आत्मदाह कर लेगा. मांग पूरी नहीं हुई और उसने निर्धारित जगह जाकर पूर्व घोषित समय पर दिन दहाड़े आत्मदाह कर लिया.
छह दिन तक अस्पताल में जिंदगी के मौत से संघर्ष के बाद रविवार को उसकी इहलीला समाप्त हो गई. जिस वक्त मैं यह शब्द लिख रहा हूं उसका मृत शरीर पूर्ण दाह की प्रतीक्षा में रखा हुआ है क्योंकि अब उसकी मौत पर राजनीति की बिसात बिछ चुकी है. दिन भर शहर में उसके समुदाय के लोग सड़कों पर प्रदर्शन करते रहे. शाम को जब शव आया तो अंतिम संस्कार करने से रोक दिया गया क्योंकि प्रशासन से उसकी मौत का मुआवजा मांगा जा रहा है.
मैं इस मामले को सिर्फ इसलिए विस्तार से लिख रहा हूं क्योंकि यह हमारे समाज के कई कड़वे दुर्भाग्यों का दस्तावेज है. एक इंसान को स्कूल की बिल्डिंग बनवाने के लिए अपनी जान देनी पड़ी और तुर्रा यह कि प्रशासन अब भी कह रहा है कि उस इलाके में जमीन उपलब्ध नहीं है. राज्य सरकार दावे करती है कि कोई भी स्कूल भवन विहीन नहीं रहेगा और यहां ऐसे कई दर्जन स्कूल हैं जिनका भवन नहीं है.
प्रशासन अब लीपा पोती करने की तैयारी में जुटा है. जांच कर ली गई, कोई बलि का बकरा तलाशा जाएगा. लेकिन एक इंसान बेवक्त मारा गया, जो अब वापस नहीं आएगा. उसकी पत्नी बेवा और बच्चे अनाथ हो गए, उन्हें अब उसका साथ कभी नहीं मिल सकेगा. लेकिन यह गूंगा-बहरा समाज और संवेदनहीन प्रशासन इससे कतई प्रभावित नहीं हैं.
ये किस तरह का समाज हमने बना लिया है, जहां मानवीय संवेदनाएं मर चुकी हैं. क्यों एक इंसान स्कूल बनवाने के लिए इस तरह अपनी जान गंवाने पर मजबूर हो गया? इस मौत का जिम्मेदार कौन है? ऐसे हजारों सवाल हैं जिनके जवाब शायद कोई नहीं देगा. आखिर एक अदने से इंसान की मौत ही तो हुई .......
बकौल दुष्यंत:
इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात,
अब किसी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां
Tuesday, January 8, 2008
और तुम्हारी नस्ल क्या है गोरो?
इंसान की नस्लों में भेदभाव का चलन क्यों शुरू हुआ और कैसे शुरू हुआ यह तो मैं नहीं बता सकता क्योंकि मैं इस क्षेत्र का विशेषज्ञ नहीं हूं. लेकिन मैं यह देख सकता हूं कि हरभजन सिंह पर नस्लभेदी टिप्पणी करने का आरोप लगाकर प्रतिबंध का दंड देने में रंगभेद जरूर है. ध्यान दें मैने नस्लभेद नहीं रंगभेद कहा है. ये दोनों अलग अलग शब्द हैं तथापि दोनों का आशय किसी न किसी प्रकार के भेदभाव से है.
भारतीय होने के कारण रंगभेद का शिकार हमें सदियों पहले से बनाया जाता रहा है. मोहनदास करमचंद गांधी से लेकर शिल्पा शेट्टी तक यह सिलसिला बदस्तूर जारी है. हरभजन तो इसके एक और शिकार मात्र हैं. आप पूछ सकते हैं कि हरभजन पर तो आरोप है फिर वे शिकार कैसे हुए? जवाब यह है कि उन पर लगाया आरोप साबित नहीं होने के बावजूद दंडित किया जाना उनके साथ अन्याय था. इसलिए वे भेदभाव के आरोपी नहीं खुद इसके शिकार हैं.
हरभजन को इसलिए दंडित किया गया क्योंकि उनके खिलाफ गोरी चमड़ी वाले कुछ ऐसे लोगों ने गवाही दी, जो उन से लाख दर्जे ऊपर सचिन तेंदुलकर की गवाही से महत्वपूर्ण मानी गई. सचिन की गवाही भी इसीलिए नहीं मानी गई क्योंकि वे गोरी चमड़ी वाले नहीं हैं. यानि माइक प्रॉक्टर हो या माइक डेनिस (दक्षिण अफ्रीका दौरा) भारतीय कभी न कभी इन गोरों के शिकार बनते रहे हैं.
अपने आप को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए ऑस्ट्रेलियाई कप्तान की रची इस साजिश में वह सचमुच का बंदरनुमा इंसान एंड्रयू सायमंड्स मोहरा बना. यह वही सायमंड्स है जो भारत में बड़ी डींग हांक कर गया था कि मैं सिर्फ खेल से मतलब रखता हूं और बात ठीक भी है. यह भी एक खेल ही था जो ब जरिये हरभजन भारतीय क्रिकेट टीम के साथ खेला गया.
पीटर रोबक जैसा समीक्षक ऑस्ट्रेलियाई टीम की थू-थू कर रहा है, तो समझा जा सकता है कि इन गोरों ने क्या किया. इन्होंने भद्र पुरुषों के खेल के साथ बहुत अभद्रता की है. खेलों को हमेशा से भाईचारे और सद्भाव का संदेश सारी दुनिया में फैलाने का सबसे सशक्त माध्यम माना जाता रहा है. लेकिन ऑस्ट्रेलियाई टीम ने जो कुछ किया उससे न केवल क्रिकेट बल्कि सारी खेल बिरादरी शर्मसार हो रही है.
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को इस मामले में कड़ा रवैया बरकरार रखना होगा वरना यह भेदभाव का सिलसिला रुकने वाला नहीं है. यह केवल खेल की बात नहीं है. टीम भारत का प्रतिनिधित्व कर रही है इसलिए खिलाडियों का अपमान भारत का भी अपमान है. यदि बीसीसीआई की नजर में इसकी भी अहमियत नहीं है तो लानत है उन पर. यदि हरभजन को निर्दोष नहीं माना जाता तो भारत को दौरा समाप्त कर देना चाहिए.
अपने आप को सर्वश्रेष्ठ समझने का दंभ इन गोरी चमड़ी वाले बंदरों में सचमुच बहुत ज्यादा है. ये विश्व चैंपियन जरूर हैं पर एक इंसान के रूप में इनका कद बहुत बौना है. रेकार्ड बुक में सिडनी टैस्ट भले ही ऑस्ट्रेलिया ने जीता लेकिन सच्चाई सब जानते हैं. वे भी जिन्होंने यह साजिश रच कर खेल को शर्मिंदा किया. इनकी गोरी चमड़ी के नीचे काला दिल है. वे सिर्फ मैच जीते हैं लेकिन हरने वाली सिर्फ भारतीय टीम नहीं है क्योंकि सिडनी में क्रिकेट भी हारा है.
लिखने वाला Sanjay पर 8:56 AM 1 टिप्पणियाँ लेबल: ऑस्ट्रेलिया, क्रिकेट, बंदर, हरभजन






