यह तस्वीर आत्मदाह करने से पांच मिनट पहले ली गई. केसरिया कुरता पहने शिवकुमार चौधरी एक हाथ में जलता हुआ त्रिशूल और दूसरे हाथ में कैरॉसिन से भरी बोतल लिए है. उसके कपड़े कैरॉसिन से भीगे हैं.
मेरे शहर में बदअमनी फैली हुई है क्योंकि एक शख्स नाहक मौत का शिकार बन गया. सरेआम खुद पर कैरॉसिन डालकर खुद को आग लगा ली. सैकड़ों लोगों की भीड़ ने देखा पर जल जाने दिया. जहां घटना हुई वह कलेक्टर और एसपी के दफ्तरों के बीच कचहरी परिसर का केंद्र स्थल है और उस समय वहां क्षेत्र के सांसद अपना साप्ताहिक जनता दरबार लगाए बैठे थे.
करीब चालीस साल का वह इंसान दलित वर्ग से था. और उसने जान क्यों दे दी? मृतक एक प्राइमरी स्कूल के पालक शिक्षक संघ (पीटीए) का अध्यक्ष था. पिछले कई सालों से स्कूल की बिल्डिंग नहीं होने के कारण उसे एक मंदिर के परिसर में अस्थाई इंतजाम करके चलाया जा रहा है. पीटीए अध्यक्ष मांग कर रहा था कि स्कूल की बिल्डिंग बनवा दी जाए.
इस मांग के लिए पिछले साल भर से भी ज्यादा समय से वह प्रशासनिक अधिकारियों के हाथ पैर जोड़ रहा था, उनके ऑफिसों के चक्कर लगा रहा था लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. हारकर उसने पिछले महीने प्रशासन को लिखित सूचना दे दी कि अमुक तारीख तक उसकी मांग पूरी नहीं होने पर वह अमुक स्थान पर आत्मदाह कर लेगा. मांग पूरी नहीं हुई और उसने निर्धारित जगह जाकर पूर्व घोषित समय पर दिन दहाड़े आत्मदाह कर लिया.
छह दिन तक अस्पताल में जिंदगी के मौत से संघर्ष के बाद रविवार को उसकी इहलीला समाप्त हो गई. जिस वक्त मैं यह शब्द लिख रहा हूं उसका मृत शरीर पूर्ण दाह की प्रतीक्षा में रखा हुआ है क्योंकि अब उसकी मौत पर राजनीति की बिसात बिछ चुकी है. दिन भर शहर में उसके समुदाय के लोग सड़कों पर प्रदर्शन करते रहे. शाम को जब शव आया तो अंतिम संस्कार करने से रोक दिया गया क्योंकि प्रशासन से उसकी मौत का मुआवजा मांगा जा रहा है.
मैं इस मामले को सिर्फ इसलिए विस्तार से लिख रहा हूं क्योंकि यह हमारे समाज के कई कड़वे दुर्भाग्यों का दस्तावेज है. एक इंसान को स्कूल की बिल्डिंग बनवाने के लिए अपनी जान देनी पड़ी और तुर्रा यह कि प्रशासन अब भी कह रहा है कि उस इलाके में जमीन उपलब्ध नहीं है. राज्य सरकार दावे करती है कि कोई भी स्कूल भवन विहीन नहीं रहेगा और यहां ऐसे कई दर्जन स्कूल हैं जिनका भवन नहीं है.
प्रशासन अब लीपा पोती करने की तैयारी में जुटा है. जांच कर ली गई, कोई बलि का बकरा तलाशा जाएगा. लेकिन एक इंसान बेवक्त मारा गया, जो अब वापस नहीं आएगा. उसकी पत्नी बेवा और बच्चे अनाथ हो गए, उन्हें अब उसका साथ कभी नहीं मिल सकेगा. लेकिन यह गूंगा-बहरा समाज और संवेदनहीन प्रशासन इससे कतई प्रभावित नहीं हैं.
ये किस तरह का समाज हमने बना लिया है, जहां मानवीय संवेदनाएं मर चुकी हैं. क्यों एक इंसान स्कूल बनवाने के लिए इस तरह अपनी जान गंवाने पर मजबूर हो गया? इस मौत का जिम्मेदार कौन है? ऐसे हजारों सवाल हैं जिनके जवाब शायद कोई नहीं देगा. आखिर एक अदने से इंसान की मौत ही तो हुई .......
बकौल दुष्यंत:
इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात,
अब किसी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां
सोमवार, १४ जनवरी २००८
उसने सरेआम खुद को आग लगाई.....सब देखते रहे
मंगलवार, ८ जनवरी २००८
और तुम्हारी नस्ल क्या है गोरो?
इंसान की नस्लों में भेदभाव का चलन क्यों शुरू हुआ और कैसे शुरू हुआ यह तो मैं नहीं बता सकता क्योंकि मैं इस क्षेत्र का विशेषज्ञ नहीं हूं. लेकिन मैं यह देख सकता हूं कि हरभजन सिंह पर नस्लभेदी टिप्पणी करने का आरोप लगाकर प्रतिबंध का दंड देने में रंगभेद जरूर है. ध्यान दें मैने नस्लभेद नहीं रंगभेद कहा है. ये दोनों अलग अलग शब्द हैं तथापि दोनों का आशय किसी न किसी प्रकार के भेदभाव से है.
भारतीय होने के कारण रंगभेद का शिकार हमें सदियों पहले से बनाया जाता रहा है. मोहनदास करमचंद गांधी से लेकर शिल्पा शेट्टी तक यह सिलसिला बदस्तूर जारी है. हरभजन तो इसके एक और शिकार मात्र हैं. आप पूछ सकते हैं कि हरभजन पर तो आरोप है फिर वे शिकार कैसे हुए? जवाब यह है कि उन पर लगाया आरोप साबित नहीं होने के बावजूद दंडित किया जाना उनके साथ अन्याय था. इसलिए वे भेदभाव के आरोपी नहीं खुद इसके शिकार हैं.
हरभजन को इसलिए दंडित किया गया क्योंकि उनके खिलाफ गोरी चमड़ी वाले कुछ ऐसे लोगों ने गवाही दी, जो उन से लाख दर्जे ऊपर सचिन तेंदुलकर की गवाही से महत्वपूर्ण मानी गई. सचिन की गवाही भी इसीलिए नहीं मानी गई क्योंकि वे गोरी चमड़ी वाले नहीं हैं. यानि माइक प्रॉक्टर हो या माइक डेनिस (दक्षिण अफ्रीका दौरा) भारतीय कभी न कभी इन गोरों के शिकार बनते रहे हैं.
अपने आप को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए ऑस्ट्रेलियाई कप्तान की रची इस साजिश में वह सचमुच का बंदरनुमा इंसान एंड्रयू सायमंड्स मोहरा बना. यह वही सायमंड्स है जो भारत में बड़ी डींग हांक कर गया था कि मैं सिर्फ खेल से मतलब रखता हूं और बात ठीक भी है. यह भी एक खेल ही था जो ब जरिये हरभजन भारतीय क्रिकेट टीम के साथ खेला गया.
पीटर रोबक जैसा समीक्षक ऑस्ट्रेलियाई टीम की थू-थू कर रहा है, तो समझा जा सकता है कि इन गोरों ने क्या किया. इन्होंने भद्र पुरुषों के खेल के साथ बहुत अभद्रता की है. खेलों को हमेशा से भाईचारे और सद्भाव का संदेश सारी दुनिया में फैलाने का सबसे सशक्त माध्यम माना जाता रहा है. लेकिन ऑस्ट्रेलियाई टीम ने जो कुछ किया उससे न केवल क्रिकेट बल्कि सारी खेल बिरादरी शर्मसार हो रही है.
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को इस मामले में कड़ा रवैया बरकरार रखना होगा वरना यह भेदभाव का सिलसिला रुकने वाला नहीं है. यह केवल खेल की बात नहीं है. टीम भारत का प्रतिनिधित्व कर रही है इसलिए खिलाडियों का अपमान भारत का भी अपमान है. यदि बीसीसीआई की नजर में इसकी भी अहमियत नहीं है तो लानत है उन पर. यदि हरभजन को निर्दोष नहीं माना जाता तो भारत को दौरा समाप्त कर देना चाहिए.
अपने आप को सर्वश्रेष्ठ समझने का दंभ इन गोरी चमड़ी वाले बंदरों में सचमुच बहुत ज्यादा है. ये विश्व चैंपियन जरूर हैं पर एक इंसान के रूप में इनका कद बहुत बौना है. रेकार्ड बुक में सिडनी टैस्ट भले ही ऑस्ट्रेलिया ने जीता लेकिन सच्चाई सब जानते हैं. वे भी जिन्होंने यह साजिश रच कर खेल को शर्मिंदा किया. इनकी गोरी चमड़ी के नीचे काला दिल है. वे सिर्फ मैच जीते हैं लेकिन हरने वाली सिर्फ भारतीय टीम नहीं है क्योंकि सिडनी में क्रिकेट भी हारा है.
लिखने वाला Sanjay पर ८:५६ AM 1 टिप्पणियाँ लेबल: ऑस्ट्रेलिया, क्रिकेट, बंदर, हरभजन
शनिवार, ५ जनवरी २००८
पुलिस ने एक ब्लॉगर को जेल में डाला
ब्लॉगर्स के लिए यह बुरी खबर है. सउदी अरब के सबसे लोकप्रय ब्लॉग के लेखक फुआद अल फरहान को वहां की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया क्योंकि उन्होंने राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने ब्लॉग पर आवाज उठाई. सउदी अरब में काफी लोग अंग्रेजी और अरबी में ब्लॉग लिखते हैं लेकिन पुलिस के ऐसे हस्तक्षेप का यह पहला मामला है. कुवैत, बहरीन और मिस्र जैसे देशों से ब्लॉगर्स को उत्पीडि़त किए जाने के समाचार आते रहते हैं. अब सउदी अरब में भी यह शुरू हो गया है.
एक सीधे नजरिए से देखें तो ऐसी घटनाएं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का मामला दिखती है और हम कूद कर इसके खिलाफ भर्त्सना के स्वर उठाने लगते हैं. फरहान की गिरफ्तारी भी ऐसा ही मामला है और इसकी सभी निंदा कर रहे हैं. उन्हें करीब एक माह पहले पकड़ा गया था. बहरहाल क्या यह घटना सिर्फ निंदा किए जाने का विषय मात्र है? या इसके निहितार्थ कुछ और भी हैं.
मेरे ख्याल से इसका दूसरा पहलू यह है कि ब्लॉगिंग अब एक ऐसी ग्लोबल विधा बन गई है कि इसको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. एक ब्लॉगर को अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए जेल में बंद किया जाना इस बात का प्रमाण है कि ब्लॉग को लोग गंभीरता से लेते हैं. सउदी अरब की सरकार को फरहान के लेखन से कुछ नुकसान होने का अंदेशा था इसीलिए उन्हें गिरफ्तार किया गया. हालांकि यह अलग बात है कि इससे फरहान की आवाज को दबाया नहीं जा सका क्योंकि उनकी गिरफ्तारी से उन लोगों का ध्यान भी फरहान के ब्लॉग की ओर चला गया जो उसे नहीं पढ़ रहे थे.
वैचारिक अभिव्यक्ति का हनन करने के लिए दमन का रास्ता बहुत पहले से अपनाया जाता रहा है. आज भी सरकारें मीडिया को गाहे ब गाहे इस दमनवादी मानसिकता की झलक दिखलाती रहती हैं. पाकिस्तान में पिछले दिनों यही किया गया. लेकिन ब्लॉगर्स के साथ ऐसा आमतौर पर नहीं होता था. यह नई परंपरा की शुरूआत है और इससे ब्लॉगिंग को मजबूती ही मिलेगी.
भारत में भी प्रकारांतर से यह चलता रहता है. हालांकि हमारे यहां ब्लॉगर्स को इस तरह जेल नहीं भेजा जाता वरना हर दिन आधे से ज्यादा चिट्ठाकार जेल में होते. बहरहाल फरहान की गिरफ्तारी का मामला केवल निंदा करने का विषय नहीं है. इससे प्रमाणित हो गया है कि ब्लॉग एक ग्लोबल वायस बन चुका है. ब्लॉगर्स को अपनी इस ताकत का सही दिशा में और सकारात्मक इस्तेमाल करना चाहिए.





