गुरुवार, 14 फ़रवरी 2008

ब्‍लॉ‍ग जगत में अब बहस के नाम पर ऐसी गुंडागर्दी होगी


वाह दिलीप मंडल. मान गए आपको. मान गए कि आप एक अच्छे संपादक हैं. इसीलिए मेरी पूरी पोस्‍ट में से अपनी सुविधानुसार अंश छांट कर चिपका लिए. उससे भी बढि़या कारीगरी यह दिखाई क‍ि अजित वडनेरकर जी की टिप्‍पणी में करेक्‍शन भी लगा दिया. शायद आपने सोचा होगा कि उन्‍होंने गलती से बारोज़गार लिख दिया है.... सो उसे मिटाकर बेरोजगार कर देते हैं. बहुत खूब. बात को अपने पक्ष में बदलने का प्रयास कर रहे थे, या गालियां देने का कोई नया बहाना तलाश रहे थे....

मुझे हैरानी है कि असहमति का एक स्‍वर उठते ही आप इतने निचले स्‍तर पर उतर आए. पिछले कई दिनों से बहस के नाम पर हमें गालियां दी जा रही हैं और असभ्‍य भाषा का प्रयोग किया जा रहा है. इसके बावजूद कि हमने सिर्फ वैचारिक असहमति ही व्‍यक्‍त की. लेकिन यह क्‍या है? मेरे चिट्ठे से मेरी सहमत‍ि के बिना पोस्‍ट के अंश और टिप्‍पणियों को कॉपी कर अपने चिट्ठे में मनचाहे ढंग से चिपका दिया और गालियां देना शुरू कर दीं.
क्‍या मैं जान सकता हूं कि आपने किस अधिकार से ऐसा किया? अजित भाई की टिप्‍पणी को जहां से उठाया गया, वह मेरा अपने मित्रों से संवाद का माध्‍यम है न कि चिट्ठे पर की गई टिप्‍पणी. चलिए इतना भी ठीक था, लेकिन उनकी टिप्‍पणी में करेक्‍शन लगा कर बात का अर्थ बदलने जैसी टुच्‍ची हरकत का क्‍या मतलब है? क्‍या साबित करना चाह रहे हैं आप? इतनी बेकरारी क्‍यों है... गालियां देने की? और मैने तो व्‍यक्तिगत तौर पर कोई असम्‍मानजनक बात नहीं कही.

क्‍या यही है आपका बहस करने का तरीका? यदि कोई बहस में शामिल होना नहीं चाहता, तो उसे गालियां देंगे. सब आपके सुर में सुर मिलाएं तो ठीक वरना आप और आपका गिरोह मिल कर उस पर कीचड़ उछालेगा, व्‍यक्तिगत तौर पर आक्षेप करेगा. मैं इसकी भर्त्‍सना करता हूं. रही आपकी बहस... सो खूब चलाएं. हमे कोई एतराज नहीं और न ही ऐसी स्‍तरहीनता पर उतर कर बहस करने के इच्‍छुक हैं.

आपका मुद्दा है मीडिया में दलितों की तलाश सो वही करें.... लेकिन आप अजित वडनेरकर या संजय की असहमति को मुद्दा क्‍यों बना रहे हैं? यह क्‍यों जरूरी है कि सभी आपसे सहमत हों? क्‍या यह गाली गलौज इसलिए है कि हमने आपसे असह‍मति जताई? या इसलिए कि पूरा जोर लगाने के बावजूद कोई आपकी बहस पर कान धरने को तैयार नहीं?

क्‍या अपने विचारों को व्‍यक्‍त करने के लिए अब हमें आपसे या आपके बद्तमीज गिरोह से अनुमति लेना होगी? आप दलितों के मसीहा बनें या बहस चलाने का प्रयास करें, पर कृपया यह बौद्धिक गुंडागर्दी चलाने का प्रयास नहीं करें. गालियां देना हम भी जानते हैं और यकीन करें यदि गाली देने के लिए हमने मुंह खोला तो आपके कान फट जाएंगे. लेकिन हमारा स्‍तर इतना गिरा हुआ नहीं है.
आप खूब प्रेम से बांसुरी बजाएं... और जरा जोर से बजाइएगा..... शायद कुछ चूहे और जमा हो ही जाएंगे.
चित्र में पहला स्‍क्रीनशॉट मेरे चिट्ठे का है और दूसरा मोहल्‍ला की उस पोस्‍ट का जिसमें टिप्‍पणी को करेक्ट करने के बाद चिपकाया गया. मेरे मित्र (ध्‍यान दें मैने यह अपने मित्रों से कहा है) स्‍वयं यह फैसला करें कि इस टुच्‍चेपन का क्‍या अर्थ है.

6 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

आखिर बहस क्यों? केवल व्यक्तिगत महत्ता को स्थापित करने के लिए? तो फिर वह बहस ही नहीं है। वह प्रदर्शन है या फिर विचित्र वेषभूषा कम्पीटीशन।
आप पूरे समाज को साथ रख कर बात करना चाहें तो बहस चल सकती है। आज तो बहस ऐसी हो गई है कि दलित अलग समाज चला लें, महिलाएं अलग और शेष लोग अलग। फिर चल गया समाज। क्या ये कथित दलित प्रवक्ता यह चाहते हैं कि दलित दलित ही रहे जिस से उन का नेतृत्व बना रहे। ये क्या यथास्थिति को बनाए रखने का प्रयत्न नहीं है?
इन बहसों से कोई लाभ नहीं। इस से तो अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग ही ठीक।
गाली गलौच कम्पीटीशन से तो अच्छा है कि इस संवाद से दूर हम अपनी बात कहें।
कहीं सामुहिक चिट्ठों पर एकाधिकार की लड़ाई तो शुरु नहीं हो गय़ी है?

अनिल रघुराज ने कहा…

संजय भाई, अच्छी बात यह है कि दलित या किसी दूसरे बहाने लोकतांत्रिक हक बात करनेवाले नकली लोग अपनी ही करनी से बहुत जल्दी एक्सपोज़ हो जाते हैं।

arvind mishra ने कहा…

तो यहाँ भी दलित दलित शुरू हो गया थू थू थू...इस शब्द का जनक कौन है ?बापू ने कितना अछा शब्द दिया था -हरिजन .

संजय तिवारी ने कहा…

हो सकता है कापी पेस्ट में कोई गड़बड़ हो गयी हो.

संजय तिवारी ने कहा…

हो सकता है कापी पेस्ट में कोई गड़बड़ हो गयी हो.

आशीष ने कहा…

छोटी मुंह बड़ी बात, लेकिन कहना तो होगा, बहस अधिक ईमानदारी से हो तो मजा आता