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बुधवार, 26 दिसंबर 2007

क्‍योंकि वे नहीं जानते क्‍या कर रहे हैं.....

उड़ीसा का ऐसी आगजनी से पुराना नाता है. ईसा मसीह के जन्‍मदिन पर कंधमाल में चर्चों पर हमले कर आग लगा दी गई. कुछ साल पहले ऐसी ही एक आग में ग्राहम स्‍टेंस और उनके बेटे को जिंदा जलना पड़ा था. हत्‍यारा आज भी जीवित है और हिंदुत्‍व के रखवालों ने उसे हीरो बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यह इंसानी असहिष्‍णुता की कौन सी कहानी है जो बार-बार लिखी जाती है? यह समझना मुश्किल है कि गिरिजाघरों को जला कर किस हिंदुत्‍व की रक्षा की जा रही है?

हम गांधी को भुला चुके हैं लिहाजा आज उनकी दी हुई सीखों को उद्धृत करना शायद अप्रासांगिक हो चुका है. लेकिन गांधी कभी अप्रासंगिक नहीं होंगे. उस महात्‍मा ने कुछ दशक पहले कहा था कि ईश्वर सत्‍य नहीं बल्कि सत्‍य ही ईश्वर है. तो गिरिजाघरों की आग से जो सत्‍य निकल कर सामने आ रहा है क्‍या वही ईश्वर है?

यह कौन सा दर्शन है? हम मंदिर बनाने के लिए मस्जिद तोड़ देते हैं. गरिजाघरों को आग लगा देते हैं. हम किस सत्‍य की स्‍थापना कर रहे हैं? यह असहिष्‍णुता और उन्‍माद हिंदुत्‍व तो नहीं. तो फिर यह है क्‍या? यह किस समाज और संस्‍कृति का प्रतिनिधित्‍व करता है? यह निश्चित रूप से भारतीय समाज की परंपरा और संस्‍कृति तो नहीं है.

इन सवालों के जवाब मुझे भी नहीं मालुम. जिस देश की गंगा-जमुनी संस्‍कृति में सर्वधर्म समभाव और भाईचारा सदियों से समाहित रहा हो, वहां धर्म के नाम पर ऐसा उन्‍माद, ऐसी बर्बरता कई सवालों को जनम देती है. इस समाज को यह स्‍वयं तय करना होगा कि इसका सत्‍य क्‍या है? अयोध्‍या, गोधरा, उड़ीसा ... अब और कहां? कितनी आग और?

कभी किसी धर्मग्रंथ में पढ़ा था कि ईश्वर एक है, उसके नाम अलग हैं, रूप अलग हैं. यह भी पढ़ा है कि हर इंसान के अंदर परमात्‍मा का अंश है, जिसे आत्‍मा कहते हैं. और यह भी कि आत्‍मा कभी मरती नहीं. मतलब यह कि सभी इंसान परमात्‍मा का अंश हैं. तो यह आतंकवाद, नक्‍सलवाद, जा‍तीय हिंसा और सांप्रदायिकता कहां से आई? एक इंसान की दूसरे के प्रति नफरत की इस आग में इंसानियत और धर्म कहां है?

कितने और कश्‍मीर, कितने और गोधरा, कितने और गुजरात? कितने और धमाके? कितनी और लाशें? कितने और लादेन? कितने और दारासिंह? किस सत्‍य की तलाश है ये? कब रुकेगी यह नफरत की आंधी? मेरे पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं. वह एक वाक्‍य ही फिर याद आ रहा है: हे ईश्वर इन्‍हें क्षमा कर देना क्‍योंकि ये नहीं जानते ये क्‍या कर रहे हैं.....

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संजय उवाच को मैने अपने जालस्‍थल पर स्‍थानांतरित कर दिया है. नया पता यह है.... Sanjay Uvach http://www.sanjayuvach.com